कोरबा। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी किए गए तत्काल प्रभावशील तबादला आदेश के चार माह बाद भी संबंधित अधिकारी की कार्यमुक्ति नहीं होने का मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग मंत्रालय रायपुर द्वारा 20 फरवरी 2026 को जारी स्थानांतरण आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि संबंधित अधिकारी को 10 दिनों के भीतर कार्यमुक्त किया जाए तथा आगामी माह का वेतन नवीन पदस्थापना स्थल से आहरित किया जाए। इसके बावजूद आदेश के कई माह बीत जाने के बाद भी अधिकारी कोरबा जिले में ही कार्यरत बताए जा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, मोहनीश आनंद देवांगन, जो पूर्व में जनपद पंचायत करतला में मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) के पद पर पदस्थ थे, उनका स्थानांतरण शासन द्वारा सहायक परियोजना अधिकारी के रूप में जिला पंचायत सूरजपुर किया गया था। हालांकि, उन्हें कोरबा जिले से कार्यमुक्त नहीं किया गया और बाद में जिला पंचायत कोरबा में सहायक परियोजना अधिकारी के रूप में पदस्थ कर दिया गया। इस दौरान उन्होंने सूरजपुर में कार्यभार ग्रहण नहीं किया।
इसके बाद तत्कालीन कलेक्टर कोरबा द्वारा 3 फरवरी 2026 को जारी एक आदेश के तहत जनपद पंचायत पाली के सीईओ भूपेंद्र कुमार सोनवानी के अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने के कारण प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने हेतु मोहनीश आनंद देवांगन को पाली जनपद पंचायत का प्रभार सौंपा गया। वे पाली में कार्य करते रहे।
इसी बीच पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा 20 फरवरी 2026 को जारी नवीन तबादला आदेश में पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए मोहनीश आनंद देवांगन का स्थानांतरण सहायक परियोजना अधिकारी, जिला पंचायत सूरजपुर से मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जनपद पंचायत सक्ती के पद पर कर दिया गया। शासन के आदेश में यह भी उल्लेख किया गया था कि स्थानांतरण तत्काल प्रभाव से लागू होगा तथा निर्धारित समय सीमा में कार्यमुक्ति सुनिश्चित की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, आदेश जारी होने के चार माह बाद भी संबंधित अधिकारी कोरबा जिले से कार्यमुक्त नहीं किए जा सके हैं। इस स्थिति ने शासन के आदेशों के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि शासन स्तर से जारी स्पष्ट निर्देशों का पालन समय पर नहीं हो रहा है, तो इसका प्रभाव अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानांतरण प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके पालन में अनावश्यक विलंब से शासन की मंशा प्रभावित होती है। शासन द्वारा जारी आदेशों का समयबद्ध पालन सुनिश्चित करना जिला प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे मामलों में विलंब होने से आमजन के बीच प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
बताया जा रहा है कि कोरबा जिले में यह कोई पहला मामला नहीं है, जहां स्थानांतरण आदेश के बावजूद अधिकारी निर्धारित समय में नई पदस्थापना स्थल पर नहीं पहुंचे हों। पूर्व में भी कुछ विभागों में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर शासन के आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही पर बहस को जन्म दे दिया है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं तथा शासन के आदेश का पालन कब तक सुनिश्चित किया जाता है। फिलहाल यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और अनुशासन के संदर्भ में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।
